रावण जन्म से एक पंडित था तो राक्षस कैसे बन गया? कहलाया?

रावण रामायण का एक प्रमुख प्रतिचरित्र है। रावण लंका का राजा था। वह अपने दस सिरों के कारण भी जाना जाता था, जिसके कारण उसका नाम दशानन भी था।

रावण पुलस्त्य मुनि का पौत्र (पुलस्त्य मुनि के पुत्र विश्रवा का पुत्र) था। विश्वश्रवा की वरवर्णिनी और कैकसी नामक दो पत्नियां थी।

विश्रवा की 2 पत्नियों, वरवर्णिनी ने बड़े बेटे कुबेर को जन्म देने के बाद छोटी पत्नी केकसी ने रावण, कुम्भकरण, बिभीषण, खर और दूषण को जन्म दिया था। केकसी ने दो पुत्र्यिओं श्रुपनाखा और कुभ्नी को भी जनम दिया था. वरवर्णिनी एक ब्राह्मण खानदान से और कैकसी एक राक्षस खानदान से. यानी रावण जन्म से दोनों हो गया, ब्राह्मण भी और राक्षस भी. लेकिन फिर भी रावण ब्राह्मणों जैसे कार्य ही करता था. फिर वो राक्षस बुद्धि का क्यूँ और कैसे हो गया, निचे बताया है.


रावण जन्म का सयोंग कुछ इस तरह से बना था। पूर्वकाल की बात है वैकुंठ लोक में जय-विजय नामक दो द्वारपाल थे. एक बार उन्होंने शौनकादि बालक ऋषियों को वैकुंठ में जाने से रोक दिया था, उन्हें लगा कि बालकों को भला भगवान के पास क्या काम है. तब शौनकादि ऋषियों में से एक बालक ऋषि ने जय विजय को श्राप दे दिया कि तुम दोनों ने वैकुंठ लोक में मृत्युलोक जैसा नियम का पालन किया और स्वयं श्री हरि के द्वार पर सेवा में रहते हुये इतना ज्ञान भी नहीं है अत: तुम मृत्युलोक को प्राप्त हो जाओगे. इसी बीच आवाज सुन कर स्वयं भगवान विष्णु उन शौनकादि ऋषियों को लेने आ गये. उन्होंने तथा जय-विजय ने ऋषियों से क्षमा माँगी. इस पर ऋषियों ने कहा कि श्राप वापस नहीं हो सकता, समय आने पर तुम्हें मृत्युलोक जाना ही होगा, पर जैसे स्वयं श्री हरि हमें लेने आये है वैसे ही वो तुम्हें भी वापस वैकुंठ लोक लाने के लिये मृत्युलोक में आयेंगे. उन्ही जय विजय ने रावण और कुम्भकर्ण के रूप में जन्म लिया.

दुसरा कारण यह था कि एक बार नारदजी को अपनी भक्ति पर अभिमान आ गया और वो हर लोक में जा जा के अपनी भक्ति और तपस्या का बखान करते थे. नारद ने अपने पिता ब्रह्मदेव को बतलाया तब उन्होंने कहा ने नारद अपनी भक्ति का बखान मत करना यह अच्छा नहीं है. नारद कैलाश में गये और वहाँ भोलेनाथ को बताया. नारद अभिमान में थे कि समस्त लोकों में उन जैसा कोई नारायण भक्त नहीं है. कैलाश से लौटते हुये नारद वैकुंठ की ओर चले.

भगवन विष्णु की लीला ऐसे हुई की नारद जहाँ से निकले उस मार्ग में उन्हें एक सुंदर नगर दिखाई दिया. नारद ने सोचा मैं सभी लोकों और नगर में गया हूँ पर यह इस नगर में नहीं गया अत: यहाँ जा के देखता हूँ कौन सा नगर है. नारद वहाँ पहुँचे, बहुत सुंदर नगर था इंद्र्लोक से भी सुंदर वहाँ के राजा ने नारदजी का सम्मान किया, महल में बैठाया और स्वयँ सपरिवार नारद जी को नमस्कार किया. जलपान आदि के बाद कहा, महर्षि आप तो चिरिंजीवी, त्रिकालदर्शी महात्मा हैं मेरी पुत्री का स्वयँवर दो दिनों के बाद रखा है वैसे तो मैंने समस्त तीनों लोकों में खुला आमंत्रण दिया है कि जिसे भी मेरी पुत्री चाहेगी उसी से विवाह किया जायेगा परंतु यदि आप मुझे बता दें कि दामाद कैसा होगा तो मुझे आत्म संतोष हो जायेगा. नारद जी ने उनकी पुत्री के हस्तरेखा देख कर कहा कि आपकी पुत्री बहुत भाग्यशाली है, इसे चिरिंजीवी, अजर अमर, सुंदर और शतोगुणी प्रधान वर मिलेगा. जिसकी किर्ति समस्त लोकों में हो और नारद जी उस कन्या के रूप को देख कर मोहित हो गये उन्हें अपने आप में भी वो
सब गुण नजर आये जो उसकी हस्तरेखा बता रही थी. इसके बाद नारद जी ने बिदा ली और वैकुंठ लोक को अपनी भक्ति का बखान करने निकल पढे. रास्ते में विचार किया की मुझ मे सारे गुण है लेकिन मैं संन्यासी हूँ. अब मुझे भी सप्तऋषियोँ की तरह अपनी ग्रहस्थी बसा लेनी चाहिये. विवाह के लिये अभी जिस कन्या को देखा वो उपयुक्त है. लेकिन एक कमी है वो है मेरा रूप. पर उसकि चिंता की कोई बात नहीं क्युँकि मैं भगवान का भक्त हूँ और अभी जा के भगवान विष्णु से उनका ही रूप माँग लुंगा और उन्हें अपने भक्त को देना ही पडेगा. नारद थोडे समय बाद वैकुंठ पहुँचे भगवान ने स्वागत किया पूछा बहुत जल्दी में हो क्या बात है.

नारद ने कहा भगवन एसे ही बहुत दिन हो गये आप से मिले हुये, भगवान भोलेनाथ से मिलकर आ रहा हूँ और अब आप से मिलने चला आया. अब वैसे भी मेरे पास समय है क्युँकि तपस्या और भक्ति मार्ग की उच्च अवस्था भी प्राप्त कर ली है, ज्ञानकाण्ड, कर्मकाण्ड और भक्ति में भी अब मैं चरम सीमा पर पहुँच चुका हूँ. माया को भी जीत चुका हूँ अब सोच रहा हूँ मैं भी ग्रहस्थी बन जाऊँ. रास्ते में एक कन्या को देख कर आ रहा हूँ जो सभी गुणों से युक्त है आपसे क्या कहुँ भगवन आप तो सर्वज्ञ हैं और मैं तो आपका सब से बडा भक्त भी हूँ अत: आप मेरी सहायता किजिये. भगवान ने मुस्कुराते हुये कहा नारद तुम ग्रहस्थ बनने की चाह में लगता है कन्या के सुंदर रूप पर रोगग्रस्थ हो गये हो अत: मैं अवश्य तुम्हारे इस रोग को दूर कर दुंगा तुम चिंता मत करो. तुम मेरे सबसे बडे भक्त हो तो मुझे भी एक चिकित्सक की तरह से ही अपने भक्त के रोग को दूर करना होगा. नारद भगवान के इन वाक्यों को नहीं समझ पाये और बोले प्रभु मेरा रोग दूर करने का उपाय है आप मुझे अपना ही रूप दे दीजिये ताकि मैं बिल्कुल आप जैसा ही दिखुं ताकि वो कन्या मुझे वरण कर ले. भगवान ने कहा नारद मेरे तो बहुत रूपों हैं, लेकिन तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हें अपना एक रूप देता हूँ. नारद ने ख़ुशी ख़ुशी में उनकी बात न पूरी सुनी, न ही समझी.

नारद ने कहा प्रभु मुझे आज्ञाँ दिजिये अब मैं चलता हूँ. नारद जी खुश थे की अब वो भी भगवान विष्णु जैसे ही हो गये हैं और स्वयंवर के दिन पहुँचे. वहाँ तीनों लोक से बहुतसे लोग आये थे, राजा ने सभी को बैठने को आसन दिये. नारद जी ने अनुमान लगाया पिछली बार राजा ने मुझे महर्षि कह कर चरण धोये पर, आज सिर्फ सामान्य तरीके से प्रणाम करके आसन दिया, इसका मतलब भगवान ने मुझे अपना रूप दे दिया तभी तो ये राजा आज मुझे नहीं पहचान सका. स्वयँवर आरम्भ हुआ कन्या अपने लिये वर का चयन करने के लिये एक तरफ से आगे बढी और नारद जी एक दो बार अपनी जगह से खडे हुये कन्या का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने के लिये और जैसे ही वो पास से निकली तो नारद जी अपनी गर्दन को आगे की तरफ झुका के खडे हो गये. लेकिन कन्या आगे बढ गई और एक अन्य दिव्य पुरुष के गले में जयमाला डाल दी. कन्या का विवाह उनसे संमपन्न हुआ.

विवाह के बाद दो शिव गण जो वहाँ आये थे, वो नारद जी को देख कर बोले आप क्युँ बार–बार ऊछल रहे थे. नारद को उनकी बात पर बहुत गुस्सा आया और बोले मूर्खो हँस क्युँ रहे हो जानते नहीं मैं कौन हूँ? वो ये तो पता नहीं कौन हो पर देखने पर लगते एकदम बंदर हो, वो बंदर जो मृत्युलोक पर पाये जाते हैं. नारद ने अपना मुँह
जल में देखा तो वानर का सा मुँह का नजर आया. शिव गण फिर बोले क्युँ लग रहे हो ना मृत्युलोक के बंदर और पुन: जोर से हँसें तो नारद जी को और अधिक क्रोध आ गया और उन्होंने उसी वक़्त श्राप दिया की जिस विष्णु ने मुझे ऐसा बनाया है, वो विष्णु भी त्रेता युग में ऐसे ही, जैसे मैं अपनी प्रियतम के लिए भटक रहा हूँ, अपने प्यार, पत्नी वियोग में भटकेगा और तुम जो मुझे बानर जैसा कह कर हंस रहे हो, तुम शिवगण, मैं तुम्हें श्राप देता हूँ तुम भी उस युग में राक्षस कुल में जन्म लेकर बंदरओं से ही पिटोगे और अपना जन्म पूरा करोगे.

इसके अतिरिक्त तीसरा योग था प्रतापभानु जो चक्रवर्ति राजा होने के लिये लालच में ब्राह्मणों के श्राप का शिकार हो जाता है जिसकी कथा फिर किसी आर्टिकल में करेंगे जो की सीताजी के जन्म से भी जुडी है.

इन तीनों श्राप (जय-विजय, शिव गण और प्रतापभानु) से और इन सभी के अंश के रूप में प्रकट हुआ रावण. प्रतापभानु का राजसी गुण, शिव गणों का तामसी गुण और जय–विजय का भक्ति का गुण, इन तीनों व्यक्तियों के गुणों की प्रधानता लिये जन्म लिया रावण ने.

इसके आगे अगर पढना चाहते हैं तो इस नेक्स्ट आर्टिकल पढ़ सकते हैं.

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